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जल संघर्ष...

जल है तो कल है-जल ही जीवन है -Save water-Save Life

         आज हमारा स्वार्थ प्राकृतिक जल स्रोतों पर भी भारी पड़ रहा है। हम अपने इसी स्वार्थ में घिरकर धड़ल्ले से जल स्रोतों का दुरुपयोग कर रहे हैं। जल प्रदूषण को लेकर परिस्थितियां निरंतर गंभीर होती जा रही हैं। शायद यही कारण रहा है कि आज हमें जलस्रोतों के संरक्षण के लिए आज का दिन मनाना पड़ रहा है… देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि दो विश्वयुद्ध हो चुके हैं और तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। वाजपेयी के इस कथन से हम पानी के महत्त्व को आंक सकते हैं। 
        22 मार्च का दिन पानी बचाने तथा पेयजल स्रोतों के संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। जल दिवस एक ऐसा दिन है जो पूरा वर्ष हमें जल प्रबंधन एवं इसके रखरखाव के लिए सचेत करता है। अगर पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखना है, तो जल संरक्षण बहुत ही जरूरी है। जल की उपलब्धता तथा शुद्ध पेयजल की ओर विश्वभर में जल प्रबध्ांन से संबंधित वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रशासन एवं समाज सुधारक जलयोद्धा इस विकट समस्या के समाधान के प्रति प्रयत्नशील हैं। 
         संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1992 से हर वर्ष 22 मार्च को अंतरराष्ट्रीय विश्व जल दिवस मनाने का उद्देश्य विश्व स्तर पर जल समस्या के प्रति जागरूक करना है। इस वर्ष जापान टोक्यो में विश्व जल दिवस मनाने का उद्देश्य जीवन के लिए जल एवं ऊर्जा पर विश्व भर का ध्यान आकर्षित करना है। वैदिक संस्कृति में जल का महत्त्व आमजन से लेकर वृष्टि यज्ञ तक है और इसे जीवन कहा गया है। जल संसाधनों के अनुचित प्रयोग से सारा संसार चिंतित है। अगर इसी तरह जल की बर्बादी का प्रचलन रहा, तो जल की कमी के कारण न केवल अनाज बल्कि दूसरी वनस्पतियां प्रभावित हो जाएंगी और प्राणियों को कई रोगों और महामारियों से जूझना पड़ेगा। लगभग एक प्रतिशत से भी कम जल मृदुजल है, जो झीलों, तालाबों, नदियों एवं भूमिगत जल के रूप में उपलब्ध है। 
          जनसंख्या की बढ़ोतरी के साथ पानी एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों की मांग बढ़ी है। आधुनिक जीवन में मानव के रहन-सहन में बदलाव हुआ है। नियमित, वाशिंग मशीन के इस्तेमाल, शावर बाथ स्नान, फ्लश टायलट, शहरों में प्रतिदिन वाहन धोने, प्रदूषण एवं पानी के गलत इस्तेमाल से जल पर और दबाव बढ़ा है। वस्तुतः जल की एक-एक बूंद को बचाने के लिए सजग होना पड़ेगा। हमारे देश में 50 मिलीमीटर से अधिक वर्षा होती है। हमारी आंखों के सामने वर्षा का जल बिना उपयोग किए बह जाता है और हम बूंद-बूंद को तरसते हैं। वर्षा जल संग्रहण से हम इसका संवर्द्धन कर सकते हैं बशर्ते कि आम जनमानस जागरूक हो। जल में यह गुण है कि प्रत्येक पदार्थ को अपने में घोल लेता है और यही गुण इसका अवगुण बन जाता है, जब गंदगी इसमें घुल जाती है। 
           दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 1500 घन किलोमीटर गंदे जल का निर्माण होता है। हमें प्रतिदिन 30 से 50 लीटर जल की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद आज 884 मिलियन लोगों को सुरक्षित जल उपलब्ध नहीं है। 90 प्रतिशत बीमारियां अशुद्ध पेयजल से फैलती हैं। इसलिए पीने के पानी की जांच जरूरी है।  आज हम अपने इस स्वार्थ में घिरकर धड़ल्ले से जल स्रोतों का दुरुपयोग कर रहे हैं। जल प्रदूषण को लेकर परिस्थितियां निरंतर गंभीर होती जा रही हैं। शायद यही कारण रहा है कि आज हमें जल स्रोतों के संरक्षण के लिए आज का दिन मनाना पड़ रहा है।
         पीने वाले पानी के स्रोतों की स्वच्छता को गांव स्तर पर आंका जाना जरूरी है। आज भी गांवों में कई जलस्रोत ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में क्यों न सरकार भी इन स्रोतों के पुनरुत्थान के लिए आगे आए। अगर आज भी हमारी सरकार इन स्रोतों के संरक्षण के लिए आगे आ जाती है तो निकट भविष्य में पनपने वाली विकट जल समस्या से बचा जा सकता है। जल मनुष्य क्या हर जीव की बुनियादी जरूरत है। इसलिए इसे नजरअंदाज करना जीवन से खिलवाड़ करने जैसा ही माना जाएगा। हर किसी का कर्त्तव्य है कि जल संरक्षण में योगदान करे। हमारी संस्कृति में जल को देवता कहा गया है। धार्मिक अनुष्ठान, विवाह आदि मांगलिक कार्य जलपूजन से ही शुरू होते हैं। शुद्ध जल महाऔषधि बनकर शरीर को स्वस्थ रखता है। 
अगर आज शुद्ध जल को संभालेंगे तभी हमारा कल संवरेगा, क्योंकि जल ही जीवन है।

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