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मोदी के नहाने से गंगा मैली हो जाएगी : हरिप्रसाद
लोकसभा चुनाव के दौरान नेताओं के बेतुके बयानों का सिलसिला थम नहीं रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने शनिवार को कहा कि मोदी के नहाने से गंगा मैली हो जाएगी। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बी.के.हरिप्रसाद ने शनिवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वर्ष 2002 में.... और देखे►

हरित भूमि.....

हरित भूमि , वृक्ष लगाए-पर्यावरण बचाये,पेड़ लगाए -harit bhumi
        आज संपूर्ण विश्व में प्रत्येक प्राणी का जीवन खतरे में है, इन सबका मुख्य कारण है बढ़ता हुआ पर्यावरण प्रदूषण। आज धरती पर हर जीव इस समस्या से जूझ रहा है। विश्व के सभी देश इस समस्या का समाधान ढूढ़ने में लगे हुए है और यदि कुछ दिनों में इसका समाधान नहीं मिला तो वो दिन दूर नहीं जब शायद पृथ्वी का अस्तित्व भी न रह जाय! विश्व पर्यावरण दिवस - वृक्ष लगाओ धरती बचाओपर्यावरण संरक्षण तथा इसे पहुंच रहे खतरों के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर वर्ष 5 जून के दिन को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाने का निर्णय लिया गया। इसकी स्थापना 1972 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में की गई थी जिस दिन यूनाइटिड नेशन्स कांफ्रैंस ऑन ह्यूमन एन्वायरनमैंट का आयोजन किया गया था। प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन 5 जून, 1973 को किया गया था। 
             गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से वर्षा की मात्रा में कहीं अत्यधिक कमी तो कहीं जरूरत से बहुत अधिक वर्षा जिससे कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा पड़ रहा है, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, मौसम के मिजाज में लगातार परिवर्तन, सुनामी और भूकम्प ने संपूर्ण विश्व में तबाही मचा रखी है, पृथ्वी का तापमान बढ़ते जाना जैसे भयावह लक्षण लगातार नजर आ रहे हैं। मौसम का बिगड़ता मिजाज मानव जाति, जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों के लिए तो बहुत खतरनाक है ही, साथ ही पर्यावरण संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा है। मौसम एवं पर्यावरण विशेषज्ञ विकराल रूप धारण करती इस समस्या के लिए औद्योगिकीकरण, बढ़ती आबादी, घटते वनक्षेत्र, वाहनों के बढ़ते कारवां तथा तेजी से बदलती जीवन शैली को खासतौर से जिम्मेदार मानते हैं। 
             विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 10 हजार वर्षों में भी पृथ्वी पर जलवायु में इतना बदलाव और तापमान में इतनी बढ़ौतरी नहीं देखी गई, जितनी पिछले कुछ ही वर्षों में देखी गई है। पृथ्वी तथा इसके आसपास के वायुमंडल का तापमान सूर्य की किरणों के प्रभाव अथवा तेज से बढ़ता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने के बाद इनकी अतिरिक्त गर्मी वायुमंडल में मौजूद धूल के कणों एवं बादलों से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में लौट जाती है। इस प्रकार पृथ्वी के तापमान का संतुलन बरकरार रहता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वायुमंडल में हानिकारक गैसों का जमावड़ा बढ़ते जाने और इन गैसों की वायुमंडल में एक परत बन जाने की वजह से पृथ्वी के तापमान का संतुलन निरंतर बिगड़ रहा है। हानिकारक गैसें : कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, मीथेन पर्यावरण असंतुलन के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। 
            दरअसल पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि और मौसम के मिजाज में निरन्तर परिवर्तन का प्रमुख कारण है वायुमंडल में बढ़ती ग्रीन हाऊस गैसों की मात्रा। औद्योगिक क्रांति तथा वाहन इत्यादि तो इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं ही, इसके साथ-साथ वनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया जाना भी इस समस्या को विकराल रूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता रहा है। पेड़-पौधों द्वारा अपना भोजन तैयार करते समय संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य की किरणों के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड गैस का भी काफी मात्रा में प्रयोग किया जाता है और अगर वनों का इस कदर अंधाधुंध सफाया न हो रहा होता तो कार्बन डाइऑक्साइड गैस की काफी मात्रा तो वनों द्वारा ही सोख ली जाती और तब पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में ग्रीन हाऊस परत इतनी सशक्त भूमिका न निभा रही होती। 
              समुद्र भी प्रतिवर्ष वायुमंडल से करीब दो अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड गैस अपने अंदर ग्रहण कर लेते हैं, जिसके फलस्वरूप ग्रीन हाऊस गैसों का प्रभाव कम हो जाता है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के चलते कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करने की समुद्र की क्षमता में भी अब 50 फीसदी तक कमी आने की संभावना है। संयुक्त राष्ट्र ने अपने एक पत्र में लिखा कि जिस तेजी से विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है, उससे यह तो पक्का है कि 2050 में खाने-पीने, रहने आदि की बड़ी मारा-मारी होगी। इसलिये हमारी जिम्मेदारी बनती है कि प्रकृति के संसाधनों का अगर हम दोहन कर रहे हैं, तो उनकी रक्षा और संरक्षण करना भी हमारा कर्तव्य है। 
            2050 जब जनसंख्या में 9.6 बिलियन का इजाफा होगा, तब हम क्या करेंगे। दूसरी सबसे बड़ी चिंता है ग्लोबल वॉर्मिंग की। इसकी वजह से हमारे पर्यावरण को बड़ा नुकसान हो रहा है। ग्लेश‍ियर्स के बिघलने की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। अगर हम पर्यावरण की रक्षा नहीं कर पाये तो दुनिया भर के हजारों द्वीप डूब जायेंगे। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ही अब हर साल गर्मी के मौसम में जरूरत से ज्यादा गर्मी पड़ने लगी है। वहीं बारिश पिछले कई सालों से औसत से कम हो रही है। ग्लोबल वॉर्मिंग के एक नहीं हजारों कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण बेतरतीब शहरीकरण और औद्योगिकीकरण है। कुल मिलाकर पार्यवरण को बचाने की जंग तो जारी है, लेकिन जंग तेज नहीं है। इस युद्ध को तेज करने के लिये पूरी दुनिया को नेपाल से सीख लेनी चाहिये और सभी देशों को विश्व पिर्यावरण दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना चाहिये। और ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण प्रेमी बनाने के लिये जागरूक करना चाहिये।

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